ठंड जैसी कोई चीज़ नहीं होती There is no Such Thing as Cold

तकनिकी रूप से कहा जाए तो ठंड जैसी कोई चीज़ नहीं होती हैं. आप सचमुच ठंड को महसूस नहीं करते हैं और नाहीं वह चारो ओर हवा में तैरती रहती हैं. आप जब भी किसी जमी हुई चीज़ को स्पर्श करते हैं तब वहाँ पर ठंड जैसी कोई भी चीज़ मौजूद नहीं होती हैं. तो फिर वह चीज़ हैं क्या जिसे हम ” ठंडा ” कहते हैं? आइए जानते हैं.
पदार्थ, जिससे हवा, बर्फ, मनुष्य, सब कुछ बना हैं. यह सब पदार्थ परमाणुओं से बना है. कोई भी चीज़ कितनी भी सख्त या नरम क्यों न हो, उन सब के अन्दर चारो ओर परमाणु नाच रहे होते हैं. तापमान वास्तव में इन परमाणुओं के नाच का एक माप होता हैं. यानी की तापमान किसी भी चीज़ के परमाणुओं की गतिज ऊर्जा हैं. यानी की किसी भी पदार्थ में परमाणु नाचना बंद करते हैं तो उस चीज़ का तापमान पूर्ण शून्य (absolute zero) होंगा. जब थर्मोमीटर में पारा ऊपर जाता हैं तो वास्तव में हम तापमान को महसूस नहीं करते बल्कि ऊर्जा के प्रवाह को महसूस करते हैं. गर्मी को महसूस करते हैं.
कई बार हम गर्मी के प्रमाण का कम होना महसूस करते हैं, जिसे हम ठंड कहते हैं. क्योंकि ठंड कभी किसी अन्य स्वरुप में नहीं आ सकती हैं. लेकिन गर्मी कम होने पर ठंड में अवश्य बदल सकती हैं. ऊर्जा स्थानांतरित करने के तीन तरीके है. Conduction सख्त पदार्थो के बिच स्थानांतरित होती गर्मी हैं. Convection तरल पदार्थ के आंदोलन (Movement) में उपयोगी हैं. विकिरण (Radiation) विद्युत चुम्बकीय तरंगों पर निर्भर करता है.
किसी भी चीज़ के ठंडा लगने की अनुभूति मतलब उस चीज़ के परमाणु थोड़ी कम मात्रा में नाच रहे हैं. उसी तरह गर्म होने पर उस चीज़ के परमाणु ज्यादा मात्रा में नाच रहे हैं. उदहारण के लिए सोचिए की कौन सी चीज़ गर्म हैं, एक उबलते चाय की केतली, या एक हिमखंड? जाहिर है, केतली.  है ना? दोनों में एक थर्मामीटर रखेंगे तो आप देखेंगे की उबलता पानी ज्यादा पंजीकृत होगा. लेकिन हिमखंड में अधिक तापीय ऊर्जा शामिल होती हैं. मेरा मतलब हैं, सोचिये की अगर आप दोनों को अति ठंडे तरल नाइट्रोजन के एक स्विमिंग पूल में डाल दे तो स्विमिंग पूल को ज्यादा गर्म कौन करेगा? वह चाय की केतली तो नहीं ही होंगी.
तो अगर तापमान पूरी तरह से गतिज उर्जा हैं, तो किसी ठंडे दिन पर बहती हवा हमें ज्यादा ठंडी क्यों महसूस होती हैं? अगर वह तेजी से बह रही हैं तो गर्म क्यों नहीं हो जाती? इस सवाल के जवाब के लिए, अगर बहुत ही छोटे स्केल पर देखे तो, हवा में रहे अणु और परमाणु वास्तव में हमारी त्वचा में नाच रहे होते हैं. वे पहले से ही इतनी गति में होते हैं की उनमे थोड़ी बहती हवा जोड़ने पर उनके नाच में कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ता. हमारे शरीर के नोर्मल तापमान की तुलना में सर्द हवा के परमाणु थोड़े धीमी गति से नाचते हैं. शरीर के परमाणुओं की हवा के कम नाचनेवाले परमाणुओं के साथ टक्कर होती हैं और उनके कुछ कंपन ट्रान्सफर हो जाते हैं. इसलिए हम थोड़ी गर्मी खोते हैं और ठंड महसूस करते हैं.
हमे ठंड लगती हैं क्योंकि यहीं ब्रह्माण्ड का नियम हैं. ब्रह्माण्ड एक बहुत ही लंबे और धीमे मिशन पर हैं, एन्ट्रापी बढ़ाने के लिए और उर्जा को कम करने के लिए, जब तक की पूरा ब्रह्माण्ड पूरी तरह से संतुलन में न आ जाए. हमारा जीवन इसके विपरीत हैं. ब्रह्माण्ड जब तक असंतुलन में हैं तब तक ही सभी चीजों का अस्तित्व हैं.
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7 Comments

  1. NeelyIAavang

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  2. Rinku prasad

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  3. Veeru

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  4. ANIL MEHRA

    sir Yeh sabi blog kafi Achee h
    jo janne ki icha peda kerte h
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    sir mera apse ek questions h
    ki sir hum Apne jivan ko control ker sakte h kya ki hum humari age ko rok Le
    or humara kaam bi hota rahe
    sir please answer jrur dena

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  5. Amit

    Good

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  6. shivanjali pathak

    It is a interesting fact for my knowledge in science.

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