“प्रेम” क्या हैं? What Is Love In Hindi

What Is Love

प्रेम क्या हैं? प्रकृति या स्वभाव से कोई मुक्त नहीं हैं। मानव तो ठीक देवगणों के पास भी प्रकृतिजन्य गुण होते हैं। हर एक मनुष्य स्वभावगत कर्म कर के सिध्धि प्राप्त कर सकता हैं। क्योंकि कर्म ही धर्म हैं। सर्वव्यापी परमात्मा ने जगत के सर्व प्राणियों का सर्जन किया हैं। उनकी पूजा करने का यह एक ही सच्चा मार्ग हैं। स्वधर्म का पालन ही सिध्धि की कुंजी हैं। हर एक कर्म में कोई न कोई दोष तो लगा ही होता हैं लेकिन स्वभावगत कर्म करने में कोई पाप नहीं लगता हैं।

प्रेम भी एक अदभुत भाव हैं। देव से लेकर मानव तक सब पर उसका प्रभाव होता हैं। प्रेम परम सुख प्राप्त करने का एक सचोट उपाय हैं। प्रेम से ईश्वर मानव बनता हैं और मानव ईश्वर। जब प्रेम अमृत के कुछ बिंदु मानव के दिल में प्रकट होते हैं तब उसके जीवन का रासायनिक परिवर्तन हो जाता हैं। प्रेम देह को प्रफुल्लित,मन को मुकुलित और आत्मा को आनंदित कर देता हैं। प्रेम से तन,मन और जीवन भरा भरा रहता हैं। भीषण संसार में किसी के प्रेम भरे दिल को पाना जीवन का सबसे बड़ा लाभ हैं। सुन्दर व्यव्हार और मानवी का नेक आचरण मन की निर्मलता से ही संभव होता हैं। प्रेम विनम्रता और अहिंसा से किसी का भी दिल जित सकता हैं। जब मनुष्य के दिमाग में ज्ञान और बुध्धि ठूस ठूस कर भर जाती हैं तब उसका अस्तित्व धुंधला होता हुआ देखने को मिलता हैं। लेकिन जब उसके दिल में प्रेम का भाव भरता हैं तब उसका अस्तित्व खिल उठता हैं।

दुनिया में सबसे ज्यादा कीमती चीज प्रेम हैं। प्रेम जीवन को उद्दात और महान बनता हैं। पवित्र और सुधन्य प्रेम का महिमा संत तुलसी दस की चोपाई में देखे तो,प्रेम में सुख और दुःख का भेद रहता नहीं हैं।

“जेहि के हिये प्रेम रंग जामा
ता तेहि मुख नींद विसरामा 

उसमे केवल आत्मा की अभिन्नता और समर्पण का आनंद होता हैं। प्रेम विविध रंग और रूप का होता हैं। व्यक्ति से अतिक्रमी परमात्मा तक उसका प्रयाण होता हैं। गुरुप्रीति और अभिप्रिती भी उसके उच्चतम स्वरूप हैं। प्रेम में अनंतता हैं और ज्यादा से ज्यादा संतृप्त होने की जंखना हैं। सच्चा प्रेम वहीं है जो दिन प्रतिदिन बढ़ता रहे।

प्रेम उसकी जात के सिवा और कुछ देता नहीं हैं और उसकी जात के सिवा किसी में से लेता नहीं हैं। प्रेम किसी को ताबेदार करता नहीं हैं और किसी का ताबेदार बनता नहीं हैं। क्योंकि प्रेम प्रेम से ही सम्पूर्ण हैं। सिर्फ खुद कृतार्थ होने से ज्यादा प्रेम को और कोई कामना नहीं होती हैं। प्रेम मनुष्य या जीव का मूलभूत गुण हैं। प्रेम से भय पैदा होता हैं और भय से कई बार गुस्सा पैदा होता हैं और उसके बाद हिंसा।

प्रेम एक ऐसा शब्द हैं जो बोलते सब हैं लेकिन उसे जानते कुछ ही हैं। प्रेम भाव दिव्य हैं। जो नर से नारायण तक जाने के लिए समर्थ हैं। लेकिन उस भाव से हम भीगे न होने के कारण उसकी दिव्यता का अनुभव नहीं कर सकते हैं। प्रेम जैसे अलौकिक भाव को हम नें अपनी वासनाओं से रच कर ईतना विकृत कर दिया है की प्रेम शब्द उसका असली अर्थ गुमा कर घृणा के पात्र बन गया हैं।

प्रेम एक ऐसा समर्पण हैं की जिसमें कोई अपेक्षा भरी हो तो वह अशुध्ध हो जाता हैं और ऐसे प्रेम का उपहार परमात्मा स्वीकार नहीं करता हैं। जीवात्मा जब ऐसा ईच्छा रहित सहज समर्पण परमात्मा को कर देता है तब उसके दिल में पहली बार आनंद की एक ऐसी लहर उठती हैं जिसका वर्णन करना असम्भव हैं। ऐसे प्रेम से व्यक्ति का सम्पूर्ण रूपांतर हो जाता हैं। ऐसे प्रेम का अनुभव मीरा,गोकुल की गोपियाँ और राधा को होते ही वे सब अमर हो गए।

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समर्पण और प्रेम यह दोनों एक दूसरे से पर्याय हैं। प्रेम के बिना समर्पण नहीं हो सकता और समर्पण के बिना प्रेम। यहीं पर समर्पण एक निर्बल की शरणागति नहीं हैं। जगत में प्रेम के जैसा कोई बलशाली भाव नहीं हैं फिर भी प्रेम समर्पण की तरफ जाता हैं। खुद के इष्ट पात्र के सामने जुक जाता हैं। जिस प्रेम में अहंकार का अस्तित्व होता हैं वह प्रेम कदापि जुक नहीं सकता या समर्पित नहीं हो सकता। ज्ञान में अहंकार के लिए अवकाश रहता हैं जिससे अहंकार उत्पन्न होता हैं। अहंकार प्रश्न करता हैं जब की प्रेम समर्पित हो कर खुद एक प्रश्न की तरह बन जाता हैं।

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प्रेम एक सेतु हैं जिस पर सवार होकर व्यक्ति समष्टि तक पहुँच जाता हैं। क्योंकि प्रेम एक बहाव हैं। बहना प्रेम का स्वभाव हैं और समर्पण प्रेम की पूर्वशर्त हैं। परमात्मा प्रेम के सिवा और कोई भाषा जानता नहीं हैं। जहाँ पर भाषा का कोई शब्द पहुँचने में समर्थ नहीं हैं वहा प्रेम बिना मुश्किल से पहुँच जाता हैं। इसलिए गोकुल की आहिर कन्याओं ने जो देखा वह ज्ञानियो के ज्ञान में और ऋषिओं के ध्यान में भी नहीं मिला। प्रेम का एक शब्द वर्षो के ज्ञान से भी ज्यादा प्रकाशित हैं।

कोई व्यक्ति के प्रति अकारण भाव होता हैं या आकस्मिक प्रेम होता हैं तब मनुष्य के अन्दर की हर एक चीज खिल उठती हैं। वसंत ऋतू का जैसे आगमन हो जाता हैं। उसकी वाणी,वर्तन,भाव,प्रतिभाव सर्व में परिवर्तन हो जाता हैं। निर्मल,समर्पित और वासना से रहित प्रेम से मानवी के तन,मन और वाणी में संयम पैदा होता हैं। परमात्मा का आविष्कार होता हैं।

जिसने जीवन में प्रेम रुपी निर्मल अमृत का अंजलि भर पान नहीं किया वह परमात्मा से बहुत दूर रह जाता हैं। यह समजाते हुए भक्तकवि कबीर ने कहा हैं की ” ढाई अक्षर प्रेम के पढ़े सो पंडित होय “। जिन्होंने ढाई अक्षर के इस छोटे से शब्द को जाना हैं,देखा हैं उन्होंने जरुर ही विराट रुपी परमात्मा को देखा हैं।
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4 Comments

  1. Alok

    बहुत ही अच्छा लेख है। आज इस समाज को इस लेख का सार समझने की आवश्यकता है जो अन्य से बैर रख कर और अपने स्वार्थ से प्रेरित होकर सिर्फ अपने लोगों की सेवा करके ही अपने को पुण्यशील समझ रहा है।

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  2. JimmySFulker

    Thank you for sharing your info. I truly appreciate your efforts
    and I will be waiting for your further post thank you once again.

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  3. shiv sahu

    really, pyar ke siwa or kuch v constant nhi h. ek pyar hi h jo continuty h. pyar wo chiz h jise paa lene ke bad insan wah powrefull insan bn jata h jiski usne kalpna v na ki ho.

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  4. Naresh Kumar

    Very good love

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