Placebo Effect In Hindi प्लेसिबो इफ़ेक्ट

जब हम बीमार होते हैं या फिर अच्छा महसूस नहीं कर रहे होते तो क्या करते हैं? सीधी सी बात हैं, हम डॉक्टर के पास जाते हैं. डॉक्टर को आप कुछ पैसे देते हैं और वो बदले में आपको कुछ दवाई देते हैं और उन दवाईओं (placebo) को लेने के बाद आप ठीक हो जाते हैं. आपको यह भी नहीं पता होता की आपको कौन सी दवाई दी गयी है, क्योंकि आपको डॉक्टर पर विश्वास होता हैं की वे आपको ठीक कर देंगे. दवाई लेने के बाद आपको पता चलता हैं की डॉक्टर ने आपको जो दवाई दी थी वो दवाई तो आपकी बीमारी को दूर करने के लायक थी ही नहीं. लेकिन फिर भी उसको लेने के बाद आप ठीक हो गए. इसीको ही प्लेसिबो इफ़ेक्ट (Placebo Effect) कहते हैं.
 
ज्यादातर खोजकर्ताओं का मानना हैं की प्लेसिबो प्रभाव मन और शरीर के संबंध पर निर्भर करता हैं. जब आप कोई भी नोर्मल दवाई (जो की आपकी बीमारी के इलाज के अनुरूप न हो) लेने के बाद आप सोचते हैं की अब में ठीक हो जाऊंगा. डॉक्टर ने मुझे दवाई दी हैं तो अब किसी बात का डर नहीं. आपके मन में एक तरह का विश्वास बैठ जाता हैं की आप ठीक हो जाएंगे और आप ठीक हो जाते हैं. कुछ शोधकर्ता प्लेसिबो को एक मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया मानते हैं. क्योंकि दवाई लेने के बाद आप अच्छा महसूस करने लगते हैं और बीमारी का डर मन से हट जाता हैं और खुद बीमारी भी. हाल ही में एक खोज के दौरान शोधकर्ताओं ने देखा की प्लेसिबो असर शारीरिक प्रतिक्रियाओं के लिए भी बहुत असरकारक साबित हो सकता हैं. ज्यादातर लोग उनको दी गयी प्लेसिबो दवाइयों के लिए बुरा नहीं मानते क्योंकि कैसे भी वे ठीक तो हो ही जाते हैं.
Placebo Pills

Placebo प्रभाव के पीछे एक सिद्धांत यह हैं की वह एक विषय-प्रत्याशा प्रभाव (subject-expectancy effect) हैं. लोग पहले से ही जानते हैं की एक बार गोली खा लेने से उसका परिणाम क्या होनेवाला हैं. वे अनजाने में ही उस परिणाम के विषय पर उनकी प्रतिक्रिया को बदल  देते हैं. अगर आपको पेट मे दर्द हो, सर दर्द हो या पूरा शरीर दर्द कर रहा हो तब आप सिर्फ एक Crocin की गोली यह सोचकर ले की आप इससे ठीक हो जाएंगे. मेरा दावा हैं की आप 100% ठीक हो जाएंगे, डॉक्टर के पास गए बिना ही. जब कोई डॉक्टर आप को प्लेसिबो दवाई के रूप में गोलियाँ देते हैं तब वह ज्यादातर सिर्फ सुगर की गोलियाँ होती हैं. आप उसे खास दवाई समज कर खा लेते हैं और ठीक हो जाते हैं. प्लेसिबो असर से न केवल मस्तिस्क से संबंधित बीमारियाँ मिट जाती हैं बल्कि कई तरह के रोगों को भी मिटने के लिए असरकारक साबित हुई हैं. मांसपेशियों और नसों के आराम के लिए भी फायदेमंद हैं.

तो यह काम कैसे करता हैं? विशेषज्ञों का यह मानना हैं की यह असर इस बात पर निर्भर करती हैं की दर्दी कितनी मजबूती के साथ यह उम्मीद करता हैं की वह जल्द ही अपनी बीमारी से ठीक हो जाएगा. उसकी ठीक हो जाने की भावना जितनी मजबूत होगी उतनी ही जल्दी उसको सकारात्मक परिणाम देखने को मिलेंगे. एक मरीज और एक डॉक्टर के बीच बातचीत की वजह से एक गहरा प्रभाव पैदा हो हो सकता है. जिससे मरीज में सकारात्मक या नकारात्मक भावना आ सकती हैं. इसी तरह इस असर के नकारात्मक पहलु भी हैं. अगर आप दवाई लेने के बाद अपनी सोच सकारात्मक नहीं रखेंगे तो आप को उसके साइड इफ़ेक्ट भी हो सकते हैं. आप भले ही कितनी भी महेंगी दवाई ले लेकिन उसके बारे में नकारात्मक सोच रखेंगे तो आप जल्दी ठीक नहीं होंगे. इस तरह की असर को नोसिबो असर (nocebo effect) कहते हैं. हाल ही में हुए कुछ अध्ययनों के मुताबिक प्लेसिबो असर की वजह से हमारे शरीर में एंडोर्फिन (endorphins) के उत्पादन बढौतरी होती हैं जो की शरीर के प्राकृतिक दर्द निवारकों में से एक हैं. जो की शरीर को खुद एक डॉक्टर बनाता हैं.

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मुझे लगता हैं यहाँ पर बात हो रही हैं विश्वास की. अगर आपको डॉक्टर पर विश्वास हैं तो भी आप ठीक हो जाएंगे और गोली पर विश्वास हैं तब भी. यहाँ पर डॉक्टर और दवाई एक बहाना हैं हमारे मन को विश्वास दिलाने के लिए. यानी की जो भी कार्य होता हैं वह हमारा मन करता हैं और उसकी वजह से हमारा शरीर. अगर आप अपनी बीमारी किसी तांत्रिक के पास ले जाएंगे और वो आप को पूरी तरह से ठीक कर देने का दावा करता हैं तब भी आप ठीक हो जाएंगे. क्योंकि तब आपको बहाना मिल जाएगा किसी चीज़ पर विश्वास करने के लिए. आप अपने शरीर को छोड़कर किसी और चीज़ पर ज्यादा भरोसा करते हैं क्योंकि वे ठीक कर देने का दावा करती हैं. तो प्लेसिबो असर के लिए दावा ही एक दवा हैं.

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