जीवन क्या हैं?

What is Life?

जन्म लेना अपनी इच्छा की बात नहीं हैं। ऐसे भले – बुरे कर्म का फल पाना भी जीव के बस की बात नहीं हैं। इस लिए कहते है की पूर्वजन्म के भले – बुरे कर्म का फल स्वरुप परमात्मा ही जीवन देता है। भगवद्  गीता मै भगवान श्री कृष्ण ने कहा है की ” कर्म करो लेकिन कर्मफल की इच्छा मत करो “। लेकिन यह जीवन क्या हैं? What is Life? इन्सान चाहे भले ही चन्द्र या मंगल पर पंहुचा हो , पूरे ब्रह्माण्ड की थीयरी जानता हो , पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर ले किन्तु जन्म और मृत्यु उसके हाथ में नहीं हैं। जन्म और मृत्यु की डोर केवल परमात्मा के पास ही हैं।

ब्रह्म/परमात्मा यानी शिव चेतन स्वरुप हैं। जीव भी वैसे ही चेतन स्वरुप हैं। पांच तत्वों ( पृथ्वी , वायु , जल , अग्नि , आकाश ) से बना यह शरीर दिखाई देता हैं यानी की यह एक जड शरीर हैं। इन्सान या प्राणी मर जाता हैं तो कहते की जीव निकल गया लेकिन यह दिखाई नहीं देता हैं।

जन्म के बाद जीव शारिरीक रूप से चेतनता और मानसिकता सह सजीव कहलाता हैं। इस से यह सिध्ध होता हैं की पूरे शरीर में सूक्ष्मरूप जीव होता हैं। शरीर स्थूल रूप में हैं इसलिए कह सकते हैं की जितना शरीर उतना जीव फिर भी स्थूल शरीर होने के बाद भी स्वप्न अवस्था में और कल्पना विचार के माध्यम से पूरे ब्रह्माण्ड में भी विचरण कर सकता हैं। ऐसे समाधी और तुरीय अवस्था में भी मनुष्य परमात्मा का अनुभव कर सकता हैं। परम तत्व का साक्षात्कार भी कर सकता हैं। जीव की अवस्थाएं नीचे सविस्तृत बताई गयी हैं।

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जागृत अवस्था

इस अवस्था में जीवात्मा मन – इन्द्रियों से बाह्य विषयों का प्रतक्ष अनुभव करता हैं। वस्तु जगत का अनुभव हमें इस अवस्था में ही होता हैं। यह जब बहिर्मुख होता हैं तब संसार बाहर दिखता हैं।

स्वप्न अवस्था

स्वप्न अवस्था में जीव मानसिक प्रतिमाओ के आंतरिक जगत का सर्जन करता हैं। मन जब अंतर्मुख होता हैं तब शरीर के अन्दर के अत्यंत सूक्ष्म शरीर में बाहर की तरह के ही संसार की रचना करता हैं। ” इन्द्रियों के संवेदन के बिना होता प्रत्यक्ष ” ही स्वप्न अवस्था हैं। स्वप्न अवस्था में जीव परमसत तो होता ही हैं किन्तु  उपाधियों से घिरा होता हैं। स्वप्न अवस्था में इन्द्रिय आराम लेती हैं परन्तु मन क्रियाशील होता हैं। यह जागृत अवस्था और सुषुप्ति अवस्था के बीच की अवस्था हैं। स्वप्न अवस्था में मन इन्द्रियों की सहायता के बिना अकेला ही खुद अनेक प्रकार की विविध आकरोवाली सृष्टि का निर्माण करता हैं। इस कार्य को करने के लिए मन जागृत अवस्था में हुए विविध प्रकार के अलग अलग अनुभवों का उपयोग करता हैं। फिर भी स्वप्न एक पुनः स्मृति नहीं हैं। स्वप्न में होता अनुभव मन की स्मृतिओं से भिन्न भी हो सकता हैं।

सुषुप्त अवस्था

यह गहरी नींद की अवस्था हैं। इस अवस्था में मन तथा इन्द्रियां आराम करती होती हैं। और जीवात्मा मानों की उसके असली स्वरुप में ले हो गया हो। इस अवस्था में जागृत अवस्था के कोई भी गुण दिखाते नहीं हैं। मन का खुद के उपादान कारण अज्ञान में लय हो चूका होता हैं। निंद्रा की इस अवस्था में अनेकत्व का अंत होता हैं और मात्र चेतना ही रह जाती हैं। मन और इन्द्रियां शांत होने से सामान्य , लौकिक या व्यावहारिक चेतना का प्रवाह अटक जाता हैं। द्रष्टा और द्रश्य के बिच का भेद मिट जाता हैं और जीवात्मा इतने समय के दौरान परमात्मा से एक होने का अनुभव करता हैं। वैसे देखे तो नींद का मजा ही कुछ अलग होता हैं। नींद के आनंद का हम वर्णन नहीं कर सकते। इस बात से हमारे मन में यह प्रश्न उत्पन्न होता हैं की तो फिर मूर्छावस्था(बेहोशी) का स्थान कहाँ हैं ? मूर्छावस्था को स्वतन्त्र अवस्था का स्थान नहीं दिया जा सकता हैं। मूर्छावस्था का स्थान नींद और मृत्यु के बिच का हैं।

मन की ऊपर बताई गयी तीनो अवस्थाओं से हम संसार का या संसार से व्यव्हार करते हैं। लेकिन आत्मा तो मन की इन तीनो अवस्थाओं में सख्सी के तौर पे हाजिर होता हैं। नींद में हमें कौन संभालता हैं ? नींद में से जगाता कौन हैं ? संसार तो मन मात्र हैं। जहाँ मन होता हैं वही पर संसार का आभास होता हैं। आत्मा तो केवल द्रष्टा के रूप से मन के संसार के रचाने में या उसका लोप करने में सामान भाव से व्यवहार करता हैं। मन संसार को रचें तो आत्मा को हर्ष नहीं होता हैं और अगर संसार का लोप करे तो आत्मा को शोक नहीं होता हैं। इस तरह सभी अवस्थाओं में आत्मा तो निर्विकार और शांत ही रहता हैं।

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तुरीय अवस्था 

जागृत , स्वप्न और सुषुप्ति यह तीनों ही मन की अवस्थाए हैं। मन का अ – मनी भाव दर्शाती हुई चौथी अवस्था यानि तुरीय अवस्था। तुरीय अवस्था ही आत्मा का सच्चा स्वरूप हैं। यह अवस्था में आत्मदर्शन , आत्मसाक्षात्कार की अवस्था हैं। यह अनुभव सामान्य इन्सान की शक्ति से बाहर का अनुभव हैं। स्व प्रयत्न से ही इस अवस्था को प्राप्त किया जा सकता हैं। यह अवस्था परात्पर ब्रह्म के समान हैं। इस अवस्था में प्रज्ञान स्वरुप मन और ब्रह्म की एकात्मता की साधना होती हैं।

इस चौथी अवस्था को ,
अमात्र – बहिर्मुख मन और इन्द्रियों से न जानने लायक
अव्यवहार्य – जिसका शब्दों से वर्णन नहीं हो सकता वह
अद्वैत – जिसमे भिन्नता का कोई भाव न हो
शिव – जो अज्ञान , दुःख और मृत्यु से रहित हो

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आत्मा ( शुध्ध मन ) से महान आत्मा ( परमात्मा ) का अनुभव किया जा सकता हैं। तुरीय अवस्था द्वैत का अभान और अद्वैत का भान हैं। इस अवस्था की प्राप्ति आत्मा – साधना की पराकाष्टा हैं। ज्ञान की आख़िरी भूमिका हैं। जब ज्ञानी सर्वदा तन्मय हो कर वृत्ति मात्र के स्फूरण सहित निर्विकल्प समाधी में लीन रहता हैं वहीं मोक्ष हैं। वहीँ ब्रह्मपद हैं।

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