यह ब्लॉग पोस्ट अभी कहाँ पर हैं?

Where Is The Internet
जी हा, आपने एकदम सही पढ़ा इस पोस्ट के शीर्षक को. यह ब्लॉग पोस्ट अभी कहाँ पर हैं? मेरा मतलब हैं यह, अभी आपके कंप्यूटर या मोबाइल स्क्रीन पर होने के साथ साथ दूसरे कई कंप्यूटर और मोबाइल स्क्रीन पर होगी. या फिर वह गूगल के सर्वर में स्टोर हैं और इसकी कुछ सामग्री मेरे कंप्यूटर की हार्ड डिस्क में पड़ी हैं. तो ओरिजिनल कहाँ पर हैं? Where Is The Internet? बताना मुश्किल हैं. लेकिन सच कहें तो यह ब्लॉग पोस्ट अभी कहीं पर भी हो सकती हैं. क्योंकि अगर आपके पास वायरलेस इन्टरनेट कनेक्शन होगा तो ब्लॉग पोस्ट को आप इसके माध्यम से कहीं पर भी पढ़ सकते हैं. मतलब की यह कहीं पर भी हैं. लेकिन जहाँ पर अच्छी वायरलेस कनेक्टिविटी नहीं हैं वहाँ पर नहीं.
इस ब्लॉग पोस्ट का हर एक व्यू सबके लिए अलग अलग हैं लेकिन इसकी इनफार्मेशन एक ही हैं. बिल थॉम्पसन का मानना हैं की किसी भी चीज़ के डिजिटल स्वरुप का कोई भी ओरिजिनल स्त्रोत नहीं होता. देखा जाए तो इस ब्लॉग पोस्ट को अनगिनत बार कॉपी किया जा सकता हैं. इस ब्लोग पोस्ट की हर एक कॉपी अलग अलग सामग्री से अलग अलग समय पर बनी हैं, बिलकुल आपके शरीर की तरह. जैसे की हमने पहले की पोस्ट्स में देख लिया हैं की कुछ सालों के अन्दर ही आपके शरीर के सारे परमाणु प्रतिस्थापित हो जाते हैं और आपका एक बिलकुल ही नया शरीर तैयार हो जाता है. तो ओरिजिनल “आप” कहाँ हैं?
चलिए इस रूपांतरण की बात करते हैं. आपकी माता एक 3D प्रिंटर हैं जिन्हों ने आपको प्रिंट किया हैं. लेकिन रुकिए, आपके माता-पिता ने आप को बनाने के बारे में पहले सोचा होगा, फिर आपकी माता गर्भवती हुई होंगी, फिर आप बने. मतलब जिन ब्लू प्रिंट से आप बने हैं वह पहले से ही आपके माता-पिता के सचेत नियंत्रण (Conscious Control) के बाहर थे. मतलब आपकी ब्लू प्रिंट को आप एक कूट-रचना कह सकते हैं. क्योंकि इसे सोच-समजकर और जान-बूझकर कॉपी किया गया हैं, एक के बाद एक सूचनाओं को दोहराया गया हैं.
अरबों सालों पहले कभी परमाणुओं का सबसे पहला एक समूह स्वचालित रूप से इस तरह से व्यवस्थित हुआ होंगा की उनमे से एक पूरा इंसानी शरीर बन सके. वैसे यह एक सहीं कूट-रचना नहीं हैं लेकिन परिवर्तन हर समय होता रहता हैं. कॉपीयां लगातार बनती ही रहती हैं, लेकिन वे कभी एक जैसी नहीं होती. उनमे थोडा सा फरक होता हैं. लेकिन 99% आपका डीएनए किसी अन्य व्यक्ति के डीएनए से अलग नहीं होता. तभी आप कहेंगे, तो फिर हम सब अलग क्यों दीखते हैं? सही कहाँ, क्योंकि आपका दिमाग जिन चीजों को अच्छे से पहचानता हैं उनके अन्दर की असमानता को आसानी से पहचान लेता हैं. इसको Cross-Race असर कहते हैं. इसकी वजह से ही अगर आप किसी दो जुड़वाँ बच्चों को पहली बार देख रहे हैं तो उनके बिच का फर्क नहीं बता पाएंगे, लेकिन उनके साथ 5-6 दिन रहेंगे तो बता पाएंगे. हम सब का एक कॉमन वंशज हैं. एक आम व्यक्ति को बनाने के लिए उसके डीएनए को एक के बाद एक कई बार दोहराया गया हैं. दूसरे शब्दों में कहे तो इसमें बहुत सारी कूट-रचनाएँ शामिल हैं.
50 पीढ़ियों पहले का समय पृथ्वी पर के सारे इंसानों को जोड़ने के लिए काफी हैं. आज आप इस ग्रह पर रहने वाले हर किसी इन्सान के कम से कम 50 वे चचेरे भाई हैं. आप पृथ्वी पर रहनेवाली हर तरह की जीवित वस्तु के ट्रिलियन वें चचेरे भाई हैं. तकनीकी रूप से पानी, पत्थर, पेड़ों, प्लास्टिक और जो कपडे आपने अभी पहने हैं उसके आप quadrillion (1 के बाद 24 शून्य वाली संख्या) वे चचेरे भाई हैं. यह एक सुंदर धारणा है लेकिन यह नई भी है. तो अगर आपका कभी किसी अजनबी के साथ झगडा होता हैं या आपका पैर किसी पत्थर से लग जाए और आपको गुस्सा आ जाए तो यह सब सिर्फ एक परिवार का झगड़ा है.
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2 Comments

  1. ErnieHFilipi

    Excellent blog post. I definitely appreciate this website.
    Thanks!

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  2. mannaram

    सर्वप्रथम मैं आपको धन्यवाद करता हूँ ! आपने इस विश्वास और अविश्वास के बीच भरी प्रक्रिया का बेहतरीन तरीके से उल्लेख किया है ! अंतर्बोध के आधार पर मेरा मानना हैं कि रचयिता ही रचना है रचना ही रचयिता !

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